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हमारी संस्कृति में सेवा को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है। "सेवा परमो धर्मः" की बात कही जाती है। सेवा को परम धर्म मानने के पीछे बहुत ही महत्वपूर्ण तथा प्रत्यक्ष आत्मोद्वारक तत्त्व व कारक है।सेवा के अंदर दान, त्याग तथा समर्पण भाव रूपी धर्म के अंश प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों रूपों में विद्यमान है। सेवा कार्य में व्यक्ति शारीरिक श्रम (श्रमदान)के साथ- साथ धन, विचार, सद्भावना और सद्व्यवहार का भी उदारता पूर्वक दान करता है।इस प्रकार वह जरूरतमंद की सेवा के साथ-साथ अपने आप की भी सेवा करता है।अपने आप को संतुष्ट करता है और आत्मोद्धार भी करता है।

सेवा करने से आत्म-सन्तोष,मानसिक तृप्ति, संवेदनशीलता, समवर्तिता, आत्मानुशासन और समर्पण के मानवीय भावों तथा गुणों में अभिवृद्धि होती हैऔर व्यक्ति की आत्मिक शक्तियों का विकास होता है।व्यक्ति का आत्म बल बढ़ता है।श्रद्धा और विश्वास रूपी शक्तियों में प्रगाढ़ता आती है।कठोर से कठोर साधना करने से जो सिद्धियां प्राप्त होती है, वह सभी सिद्धियां निःस्वार्थ भाव से सेवा करने से स्वतः प्राप्त हो जाती है।

सही अर्थों में धार्मिक कहे जाने वाले लोगों ने निःस्वार्थ सेवा को परम धर्म की संज्ञा दी है।आज तक जो लोग भी महान हुए हैं, महापुरुष कहे और माने गये है, उन्होंने सेवा धर्म को ही निःस्वार्थ भाव से अपनाया है।सेवा के माध्यम से ही व्यक्ति स्वयं के अंदर निहित समस्त धर्म तत्वों का बोध प्राप्त कर धर्मज्ञ हो जाता है।उसके मनोविकार दूर हो जाते है।

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सेवा धर्म को अपनाकर ही समस्त उपलब्धियां प्राप्त की और अंततः राष्ट्रपिता कहलाये।सभी संतो- महात्माओं ने ज्ञान प्राप्त हो जाने के बाद सेवा कार्य को महत्व दिया और तद्हेतु सेवा संस्थानों की स्थापना कर अपने अनुयायियों को सेवा कार्य करने की सद्प्रेरणा दी।स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी रामतीर्थ, गौतम बुद्ध आदि सभी ने सेवा कार्य को ही महत्त्व दिया और सेवा संस्थान स्थापित किये।आज इन लोगों द्वारा स्थापित सेवा संस्थाएं व्यापक स्तर पर सेवा कार्य कर रही है।

तो आइए आप भी इसका हिस्सा बने और नेकी के कार्य में हाथ बढ़ाएं।

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